लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती
- सोहनलाल द्विवेदी
कई लोग इस रचना को हरिवंशराय बच्चन जी द्वारा रचित मानते हैं।
लेकिन श्री अमिताभ बच्चन ने अपनी एक फ़ेसबुक पोस्ट में स्पष्ट किया है कि यह रचना
सोहनलाल द्विवेदी जी की है।
http://www.hindisahityadarpan.in/2012/07/motivational-poem.html
मराठी अनुवादः नरेंद्र
गोळे २०१५१२१९
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धृ
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लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती
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लाटांना घाबरून नौका पार होत नाही
यत्नशीलांची कधीही हार होत नाही
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१
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नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर सौ सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना नहीं अखरता है
आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती
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छोटीशी मुंगी दाणा घेऊन चालत असते
चढते भींतींवर, शत शतदा घसरत असते
मनातील विश्वास नसांत साहस भरतो
चढून पडणे, पडून चढणे, व्यर्थ होत नाही
अखेरीस तिची मेहनत वाया जात नाही
यत्नशीलांची कधीही हार होत नाही
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॥
२
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डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाते हैं
जा जा कर गहरे पानी में खाली लौट आते हैं
मिलते ना मोती सहज ही गहरे पानी में
बढ़ता दूना उत्साह इसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती
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पाणबुडे समुद्रात डुबकी घेत असतात
खोलवर बुडी घेऊनही रिकामे परततात
तिथे मोती सहज का सापडत नाहीत
ह्या आश्चर्यानेच उत्साह दुप्पट होतो
मूठ नेहमीच काही रिकामी राहत नाही
यत्नशीलांची कधीही हार होत नाही
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३
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असफलता एक चुनौती है स्वीकार करो
कहां कमी रह गई देखो और सुधार करो
जब तक सफल न हो नींद चैन की त्यागो तुम
संघर्षो का मैदान छोड़ मत भागो तुम
किए कुछ बिना जय जयकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती
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अपयश आव्हान आहे, स्वीकार करा
काय कमी राहिली शोधा, सुधार करा
यश मिळत नाही, तोवर झोप सोडा
संघर्षाचे क्षेत्र सोडून, तुम्ही पळू
नका
काही केल्याविनाच जयकार होत नाही
यत्नशीलांची कधीही हार होत नाही
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