मराठी समश्लोकी (वसंततिलका) अनुवादः नरेंद्र गोळे २०२००४०९
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१
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प्रात: स्मरामि हृदि संस्फुरदात्मतत्त्वं सच्चित्सुखं परमहंसगतिं तुरीयम् यत्स्वप्नजागरसुषुप्तिमवैति नित्यं तद्ब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसंघ:
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सत्त्वा सकाळि स्मरतो हृदि जागते जे आनंद दे परमहंसपदी मिळे ते निद्रेतही, सजगतेत, स्वप्नात जागे ते मीच निष्कलंक ब्रम्ह, न पंचभूते
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२
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प्रातर्भजामि मनसा वचसामगम्यं वाचो विभान्ति निखिला यदनुग्रहेण यन्नेतिनेतिवचनैर्निगमा अवोचु- स्तं देवदेवमजमच्युतमाहुरग्र्यम्
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अर्चे सकाळि मनसा वचसा अगम्या वाचा विलासत कृपाप्रसादे जयाच्या वेदांत ज्यास म्हणती नच हे न दूजे जे आदि देव अच्युतात्मक तत्त्व त्याला
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३
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प्रातर्नमामि तमस:परमर्कवर्णं पूर्णं सनातनपदं पुरुषोत्तमाख्यम् यस्मिन्निदं जगदशेषमशेषमूर्तौ रज्ज्वां भुजंगम इव प्रतिभासितं वै
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तेजा सकाळि नमु दिव्य, अंधार नाशी जे वर्णतात पुरुषोत्तम पूर्ण अंशी स्फूर्ती तयाचि करते जग भासमान दोरी भुजंग ठरते जशि संशयानं
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फल
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श्लोकत्रयमिदं पुण्यं लोकत्रयविभूषणम् प्रात:काले पठेद्यस्तु स गच्छेत्परमं पदम्
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भूषणच तिन्ही लोकी असे हे श्लोक रोजची सकाळी जो म्हणे जाय सर्वोच्चपदि तो सुखे
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इति
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श्रीमच्छंकरभगवत: कृतौ परब्रह्मण: प्रात:स्मरणस्तोत्रं सम्पूर्णम्
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अशाप्रकारे श्रीमच्छंकराचार्यकृत परब्रम्हाचे प्रातःस्मरण
संपूर्ण होत आहे
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