२०२३-११-१५

गीतानुवाद-२८५: आए बहार बन के लुभा कर चले गए

मूळ हिंदी गीतः हसरत जयपुरी, संगीतः शंकर जयकिसन, गायकः मोहम्मद रफ़ी
चित्रपटः राज हठ, सालः १९५६, भूमिकाः मधुबाला, प्रदीपकुमार 

मराठी अनुवादः नरेंद्र गोळे २०२३१११५

 

धृ

आए बहार बन के
लुभा कर चले गए
क्या राज़ था जो दिल में
छुपा कर चले गए

आली, बहार झाली
मोहवून ती गेली
कसले रहस्य अंतरी
लपवून गेली ती

कहने को वो हसीन थे
आँखें थीं बेवफ़ा
दामन मेरी नज़र से
बचा कर चले गए

सांगायचे तर सुंदर
होती, डोळे तिचे फितूर
पदरास नजरेतून
वाचवून ती गेली

इतना मुझे बताओ
मेरे दिल की धड़कनों
वो कौन थे जो ख़्वाब
दिखाकर चले गए

एवढे मला सांगा
स्पंदनांनो मम जरा
कोण होती ती जी स्वप्न
दाखवून हरवली

२०२३-११-१२

गीतानुवाद-२८४: दिवाली - अटलबिहारी वाजपेयी

दिवाली - अटलबिहारी वाजपेयी
मराठी अनुवादः नरेंद्र गोळे २०२३१११२ 

धृ

जब मन में हो मौज बहारों की
चमकाएँ चमक सितारों की
जब ख़ुशियों के शुभ घेरे हों
तन्हाई में भी मेले हों
आनंद की आभा होती है
उस रोज़ 'दिवाली' होती है

जव मनात मौज बहारीची
झळकवे प्रभाही तार्‍यांची
जव शुभानंद वेढून असे
एकांतातही मेळा भासे
आनंद-उजाळा, तेज, दिसे
त्या दिवशी ’दिवाळी’ होते

जब प्रेम के दीपक जलते हों
सपने जब सच में बदलते हों
मन में हो मधुरता भावों की
जब लहके फ़सलें चावों की
उत्साह की आभा होती है
उस रोज़ 'दिवाली' होती है

जव प्रीतीदिप उजळलेले
स्वप्ने सत्यात उतरलेली
मनात मधुरता भरलेली
जव पिके डोलती हौसेची
हुरूप भरुनी राहतसे
त्या दिवशी ’दिवाळी’ होते

जब प्रेम से मीत बुलाते हों
दुश्मन भी गले लगाते हों
जब कहीं किसी से वैर न हो
सब अपने हों, कोई ग़ैर न हो
अपनत्व की आभा होती है
उस रोज़ 'दिवाली' होती है

जव प्रेमाने सुहृद पुकारती
शत्रूही आलिंगन देती
जव कुठे कुणाशी वैर न हो
सगळे आपले कुणी गैर न हो
आपलेपण भरुनी राहतसे
त्या दिवशी ’दिवाळी’ होते

जब तन-मन-जीवन सज जाएं
सद्-भाव के बाजे बज जाएं
महकाए ख़ुशबू ख़ुशियों की
मुस्काएं चंदनिया सुधियों की
तृप्ति की आभा होती है
उस रोज़ 'दिवाली' होती है

जव तन-मन-जीवन सजते सारे
सद्‌भाव संगीत निनादतसे
खुशीचा परिमळ विहरत राहे
चंदनसौदार्ह स्मित करे
संतोष भरूनी राहतसे
त्या दिवशी ’दिवाळी’ होते