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२०२२-०७-१६

गीतानुवाद-२४८: हर तरह के जज़्बात का ऐलान हैं आँखें

मूळ हिंदी गीतकारः साहीर, संगीतकारः रवी, गायीकाः लता, मुकेश
चित्रपटः आँखे, सालः १९६८, भूमिकाः माला सिन्हा, धर्मेंद्र 

नरेंद्र गोळे २०१२०४२१

धृ

हर तरह के जज़्बात का ऐलान हैं आँखें
शबनम कभी शोला कभी तूफ़ान हैं आँखें

हर भावनेचा, भावाचा, उच्चार हे डोळे
पुष्पे, कधी अंगार, झंझावात, हे डोळे

आँखों से बड़ी कोई तराज़ू नहीं होती
तुलता है बशर जिसमें वो मीजान हैं आँखें

डोळ्यांहून उजवा नसे तराजूही कुठला
तुळे ज्यात मनुष्य, तुळा तीच हे डोळे

आँखें ही मिलाती हैं ज़माने में दिलों को
अनजान हैं हम-तुम अगर अनजान हैं आँखें

डोळेच गाठ घालती, मनांची संसारी या
अनोळखी सारे, जर अनभिज्ञ हे डोळे

लब कुछ भी कहें उससे हक़ीक़त नहीं खुलती
इनसान के सच-झूठ की पहचान हैं आँखें

ओठ बोलले, तरी सत्य उमगत नाही
मनुष्याच्या सत्याची प्रचितीच हे डोळे

आँखें न झुकें तेरी किसी ग़ैर के आगे
दुनिया में बड़ी चीज़ मेरी जान हैं आँखें

परक्यापुढे अवनत न होवो तुझे डोळे
संसारात थोरच समज, असती हे डोळे

उस मुल्क़ की सरहद को कोई छू नहीं सकता
जिस मुल्क़ की सरहद की निगेहबान हैं आँखें

त्या देशाच्या हद्दीस कुणी स्पर्शू शके ना
ज्या देशाच्या सीमेचे सावध पुरे डोळे