मूळ हिंदी गीतकारः इंदिवर; संगीतः कल्याणजी-आनंदजी, गायिकाः लता
चित्रपटः सरस्वतीचंद्र, सालः १९६८, भूमिकाः नूतन, मनीष
मराठी अनुवादः नरेंद्र गोळे २००५०३०३
प्र
स्ता
व
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कहाँ चला ए मेरे जोगी
जीवन से तू भाग के
किसी एक दिल के कारण
यूँ सारी दुनिया त्याग के
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जासी कुठे बैराग्या माझ्या
आयुष्याला हारून तू
एक कुणा हृदयास स्मरुन तू
हे सारे विश्वची सोडून तू
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॥
धृ
॥
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छोड़ दे, सारी दुनिया, किसी के
लिए
यह मुनासिब नही, आदमी के लिए
प्यार से भी जरूरी, कई काम है
प्यार सब कुछ नही, जिंदगी के लिए
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सोडुनी टाकणे, जग
कुणाहीमुळे
हे नसे माणसा, या जगी
योग्य रे
प्रेम सोडून ही, कामं
असती किती
प्रेम, जगण्यास
सर्वस्व, मुळी ना असे
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॥
१
॥
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तन से तन का मिलन, हो न पाया तो क्या
मन से मन का मिलन, कोई कम तो नही
खुशबू आती रहे, दूर ही से सही
सामने हो चमन, कोई कम तो नही
चाँद मिलता नही, सब को संसार मे
है दिया ही बहुत, रोशनी के लिए
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जरी शरीरा शरीर, भेटले
ना तरी
युती मनाची मनाशी, कमी का असे
येत राहो परिमळ, दुरूनही
तरी
दृष्टिक्षेपात उपवन, कमी का असे
चंद्र ना लाभतो, सर्व
लोकांस तो
परी प्रकाशा पुरेसा, असे दीपही
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॥
२
॥
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कितनी हसरत से तकती है, कलियाँ तुम्हे
क्यूँ बहारों को फिर से, बुलाते नही
एक दुनिया उजड ही गई है, तो क्या
दूसरा तुम जहाँ, क्यूँ बसाते नही
दिल न चाहे भी तो, साथ संसार के
चलना पडता है, सब की खुशी के लिए
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किती अपेक्षेनी तुज, पाहती ह्या कळ्या
का न त्यांना पुकारून, तू फुलविशी
एक विश्वच, उजाडून
गेले जरी
दुसरे जग फिरून, का न तू
वसविशी
मन न जरी मानले, जगरहाटी
धरुन
सर्व जग तोषण्या, चालले
पाहिजे
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