२०२०-०६-०३

गीतानुवाद-१४१: तेरे प्यार का आसरा


तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ

मूळ हिंदी गीतः  साहिर लुधियानवी, संगीतकारः एन. दत्ता, गायकः लता, महेन्द्र कपूर
चित्रपटः धूल का फूल, सालः १९५९, भूमिकाः माला सिन्हा, राजेंद्रकुमार

मराठी अनुवादः नरेंद्र गोळे २०२००६०३

धृ
तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ
वफ़ा कर रहा हूँ वफ़ा चाहता हूँ
हसीनो से अहद-ए-वफ़ा चाहते हो
बड़े नासमझ हो ये क्या चाहते हो

तुझ्या प्रीतीचा आसरा चाहतो मी
प्रेम करतो आहे, प्रेमच चाहतो मी
सुंदरींची निष्ठा अशी चाहसी तू
असमंजस किती, हे काय चाहसी तू
तेरे नर्म बालों में तारे सजा के
तेरे शोख कदमों में कलियां बिछा के
मोहब्बत का छोटा सा मन्दिर बना के
तुझे रात दिन पूजना चाहता हूँ

तुझे रेशमी केस तार्‍यांनी सजवून
चंचल पावलांतळी कळ्या अंथरून
प्रीतीचे छोटेसे मंदिर बांधून
तुला रातदिस पूजू चाहतो मी
ज़रा सोच लो दिल लगाने से पहले
कि खोना भी पड़ता है पाने के पहले
इजाज़त तो ले लो ज़माने से पहले
कि तुम हुस्न को पूजना चाहते हो
कर विचार जरा मन जडवण्याच्यापूर्वी
मिळवण्यास काही गमवावेही लागे
जगाची आधी परवानगी तर घे की
सौंदर्याची पूजा करू चाहसी तू

कहाँ तक जियें तेरी उल्फ़त के मारे
गुज़रती नहीं ज़िन्दगी बिन सहारे
बहुत हो चुके दूर रहकर इशारे
तुझे पास से देखना चाहता हूँ
कुठवर जगू तुझ्या ओढीशी झुंजत
जगणे अशक्यच नसेल जर सोबत
पुरे जाहले आता दुरूनच इशारे
तुला जवळून पाहू चाहतो मी

मोहब्बत की दुश्मन है सारी खुदाई
मोहब्बत की तक़दीर में है जुदाई
जो सुनते नहीं हैं दिलों की दुहाई
उन्हीं से मुझे माँगना चाहते हो
प्रीतीचे शत्रू आहे सारेच जग हे
प्रीतीच्या नशीबीच आहे विलगणे
जे ऐकतच नाहीत मनाच्या हाकेला
त्यांकडेच मला मागू चाहसी तू

दुपट्टे के कोने को मुँह में दबा के
ज़रा देख लो इस तरफ़ मुस्कुरा के
मुझे लूट लो मेरे नज़दीक आ के
कि मैं मौत से खेलना चाहता हूँ
ओढणीच्या टोकाला ओठांत दाबून
जरा इकडे पाहा तर स्मित देऊन
मला लूट तू जवळ जरा येऊन
की मी मृत्यूशी खेळणे चाहतो मी

गलत सारे दावें गलत सारी कसमें
निभेंगी यहाँ कैसे उल्फ़त कि रस्में
यहाँ ज़िन्दगी है रिवाज़ों के बस में
रिवाज़ों को तुम तोड़ना चाहते हो
चुकीचेच दावे, चुकीच्याच शपथा
टिकतील कशा इथे प्रथा प्रीतीच्या ह्या
इथे जगणे आहे प्रथांच्याच हाती
प्रथांना तर तू मोडणे चाहसी तू

रिवाज़ों की परवाह ना रस्मों का डर है
तेरी आँख के फ़ैसले पे नज़र है
बला से अगर रास्ता पुर्खतर है
मैं इस हाथ को थामना चाहता हूँ
रिवाजांची परवा ना प्रथांचीही भीती
तुझ्या नेत्रीच्या निर्णयाचीच क्षिती
असो अडचणीचा जरी मार्ग खडतर
हा हातात हात धरू चाहतो मी





२०२०-०६-०२

गीतानुवाद-१४०: एक सवाल मैं करूँ


एक सवाल मैं करूँ एक सवाल तुम करो

गीतकारः शैलेन्द्र, संगीतकारः शंकर-जयकिशन, गायकः लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी
चित्रपटः ससुराल, सालः १९६१, भूमिकाः राजेंद्रकुमार, सरोजादेवी

मराठी अनुवादः नरेंद्र गोळे २०२००६०२

धृ
एक सवाल मैं करूँ, एक सवाल तुम करो
हर सवाल का, सवाल ही जवाब हो

एक सवाल करतो मी, एक सवाल तूही कर
हर सवालाचा जवाबही, सवाल असो
प्यार की बेला, साथ सजन का, फिर क्यों दिल घबराये
नईहर से घर, जाती दुल्हन, क्यों नैना छलकाये
है मालूम कि, जाना होगा, दुनियाँ एक सराय
फिर क्यों, जाते वक़्त मुसाफ़िर, रोये और रुलाये

प्रियाराधन, साथ प्रियाची, तरी का मन घाबरते
माहेरून का, सासरी जाता, नवरी साश्रू होते
माहित आहे, एक दिस जाणे, दुनिया अल्पनिवास
तरीही का मग, जाता जीवही, स्फुंदे अन्‌ करे उदास
चाँद के माथे, दाग है फिर भी, चाँद को लाज न आये
उसका घटता, बढ़ता चेहरा, क्यों सुन्दर कहलाये
काजल से, नैनों की शोभा, क्यों दुगुनी हो जाये
गोरे गोरे, गाल पे काला, तिल क्यों मन को भाये

चंद्रावरती, डाग असून का, त्याला येई न लाज
कळीकळीने घडता चेहरा, सुंदर का म्हटला जाय
काजळाने डोळ्यांची शोभा, दुप्पट का बर होय
गोर्‍या गोर्‍या, गालीचा तिळ का, लोकप्रिय तो होय
उजियारे में, जो परछाई, पीछे पीछे आये
वही अन्धेरा, होने पर क्यों, साथ छोड़ छुप जाये
सुख में क्यों, घेरे रहते हैं, अपने और पराये
बुरी घड़ी में, क्यों हर कोई, देख के भी क़तराये

उजेडात येते जी, मागे मागे, सावली बाय
तीच सावली, अंधारी का, सोबत सोडून जाय
सुखात का, वेढून राहती, आपलेही परकेही
येता वाईट वेळ, का म्हणून, सारे सोडती हात
किसके छूने, से मिट्टी भी, सोना हो जाती है?
किसका साया, पड़े तो दौलत, मिट्टी बन जाती है?
मेहनतकश, मिट्टी को छू ले, तो सोना हो जाए
हाथ लगे, काहिल का, दौलत मिट्टी में मिल जाए

कोणी स्पर्शिल्याने माती, होते सोने सोने?
कोणाची ती पडता छाया, दौलत माती होते?
कष्टकर्‍याच्या हाती माती, होते सोने सोने
आळशाहाती दौलत पडता, माती माती होते