सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
मूळ हिंदी कवीः निदा फाजली
मराठी अनुवादः नरेंद्र गोळे २०२४०८२१
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धृ
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सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो
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वाटेत ऊन तर असेल तरीही चलत असलास तर चल गर्दीत सर्वच आहेत तूही चलत असलास तर चल
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१
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इधर उधर कई मंज़िल हैं चल सको तो चलो बने बनाये हैं साँचे जो ढल सको तो चलो
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इथे तिथे खूप स्थळे आहेत चलत असलास तर चल घडवलेले साचे आहेत त्यात घडू शकलास तर चल
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२
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किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो
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कुणासाठी रस्ते कधी बदलतात का स्वतःलाच जर बदलवू शकलास तर चल
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३
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यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिराके अगर तुम सम्भल सको तो चलो
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इथे कुणी कुणाला रस्ता देत नाही मला पाडूनही जर तू सावरू शकलास तर चल
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४
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यही है ज़िन्दगी कुछ ख़्वाब चन्द उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो
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हेच तर जीवन आहे काही स्वप्ने काही उमेदी याच खेळण्यांत मन रमवू शकलास तर चल
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५
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हर इक सफ़र को है महफ़ूस रास्तों की तलाश हिफ़ाज़तों की रिवायत बदल सको तो चलो
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प्रत्येक प्रवासाला सुरक्षित रस्त्यांचा शोध असतो सुरक्षिततेची व्याख्याच बदलवू शकलास तर चल
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६
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कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़िज़ा ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो
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कुठे कुणी सूर्य नाही धूसर धूसर आहे हवा स्वतःच्याच बाहेर पडू शकलास तर चल
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