मूळ हिंदी गीतः शकील, संगीतः रवी, गायक: रफी
चित्रपटः चौदहवी का चांद, सालः १९६०, भूमिकाः गुरू
दत्त, वहीदा रहमान, रहमान, जॉनी वाकर
मराठी अनुवादः नरेंद्र गोळे २००८०५०३
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धृ
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चौदहवीं का चाँद हो, या आफ़ताब हो
जो भी हो तुम खुदा
कि क़सम, लाजवाब हो
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पौर्णिमेचा चंद्र वा सूर्यच जणू की तू
असशी जी कुणीही खरच अनुपमेय तू
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१
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ज़ुल्फ़ें हैं जैसे
काँधे पे बादल झुके हुए
आँखें हैं जैसे मय
के पयाले भरे हुए
मस्ती है जिसमे
प्यार की तुम, वो शराब हो
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हे केस खांद्यावरती जणू दाटलेले ढग
डोळे जणू की सोमरसे भारले चषक
मस्ती आहे ज्यात प्रेमाची, आहेस ते
मद्य तू
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२
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चेहरा है जैसे झील
मे खिलता हुआ कंवल
या ज़िंदगी के साज पे
छेड़ी हुई गज़ल
जाने बहार तुम किसी
शायर का ख़्वाब हो
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चेहरा जणू की फुललेले पद्मच सरोवरी
की जीवनाच्या संगीती कविता खरीखुरी
प्रिये बहार तू, कुणा कवीचे स्वप्न
तू
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३
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होंठों पे खेलती हैं
तबस्सुम की बिजलियाँ
सजदे तुम्हारी राह
में करती हैं कैकशाँ
दुनिया-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ का तुम
ही शबाब हो
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ओठांवर उजळती जणू स्मित फुलझड्या
मार्गी तुझ्या उजळती विश्वदीप हे दिशा
दुनियेतील सुंदरता आणि प्रीतीचे यौवन तू
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