गीतानुवाद-२४२: ग़म की अंधेरी रात में लेबल असलेली पोस्ट दाखवित आहे. सर्व पोस्ट्‍स दर्शवा
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२०२२-०३-२५

गीतानुवाद-२४२: ग़म की अंधेरी रात में

मूळ हिंदी गीतः जान निसार अख्तर, संगीतः सी.अर्जून, गायकः मोहम्मद रफ़ी, तलत महमूद
चित्रपटः सुशीला, सालः १९६३, भूमिकाः सुनील दत्त, नंदा

मराठी अनुवादः नरेंद्र गोळे २०२००४११

॥

धृ

॥

रफ़ी:

 ग़म की अंधेरी रात में

दिल को ना बेक़रार कर

सुबह ज़रूर आयेगी

सुबह का इन्तज़ार कर

रफ़ी:

दुःखद अंधार्‍या राती तू

होऊ नको मना अधीर

उगवेल सकाळ निश्चितच

प्रतीक्षा सकाळचीच कर

॥

१

॥

तलत:

दर्द है सारी ज़िन्दगी

जिसका कोई सिला नहीं

दिल को फ़रेब दीजिये

और ये हौसला नहीं

तलत:

दुःखमयच आयुष्य हे

ज्याला न आस काहीही

मनास फसवुनी पहा

तरी न धीर लाभतो

॥

२

॥

रफ़ी:

खुद से तो बदग़ुमाँ ना हो

खुद पे तो ऐतबार कर

सुबह ज़रूर आयेगी

सुबह का इन्तज़ार कर

रफ़ी:

संदेह स्वतःवरी न कर

विश्वास ठेव स्वतःवरी

उगवेल सकाळ निश्चितच

प्रतीक्षा सकाळचीच कर

॥

३

॥

तलत:

खुद ही तड़प के रह गये

दिल कि सदा से क्या मिला

आग से खेलते रहे

हम को वफ़ा से क्या मिला

तलत:

स्वतःच तळमळत असू

मनाने काय लाभले

विस्तवाशी खेळलो

प्रेमातून काय लाभले

॥

४

॥

रफ़ी:

दिल की लगी बुझा ना दे

दिल की लगी से प्यार कर

सुबह ज़रूर आयेगी

सुबह का इन्तज़ार कर

रफ़ी:

मनाची ओढ सोड ना

त्या ओढीने तू प्रेम कर

उगवेल सकाळ निश्चितच

प्रतीक्षा सकाळचीच कर