२०१२-०७-३१

गीतानुवाद-०१३: हर देश में तू, हर वेश में तू

हर देश में तू, हर वेश में तू 
तुकडोजी महाराज 

मराठी अनुवादः नरेंद्र गोळे २०१२०७३१


हर देश में तू, हर वेश में तू
हर देशीही तू, हर वेशीही तू



॥१ ॥
हर देश में तू, हर वेश में तू
तेरे नाम अनेक, तू एक ही है
तेरी रंगभूमी, यह विश्व धरा
सब खेल में, मेल में, तू ही तू है
हर देशीही तू, हर वेशीही तू
रूपात हरेक, असशी परी तू
तुझी रंगभूमी, ही सृष्टी जरी
खेळांतही तू, मेळांतही तू

॥२॥
सागर से उठा, बादल बनकर
बादल से गिरा, जल हो कर के
फिर नहर बना, नदिया गहरि
तेरे भिन्न प्रकार, तू एक ही है
सागरी उठशी, मेघांतूनी तू
पर्जन्य झरशी, जल होऊन तू
मग झर, निर्झर, नदी होशी
प्रकार अनेक, जलाशय तू

॥३॥
मिट्ठी से ही अणु, परमाणु बना
इस जीव जगत का, रूप लिया
कहीं पर्वत, वृक्ष विशाल बना
सौन्दर्य तेरा, तू एक ही है
घडला मातीतुनी, अणुरेणू
रूप जीवसृष्टीचे, शाश्वत तू
पर्वत कधी, विशाल तरूही तू
कौतूक तुझे, सत्‌ एकची तू

॥४॥
यह दिव्य दिखाया, है जिसने
यह है गुरूदेवकी, पूर्ण दया
तुकड्या कहे, कोई न और दुजा
बस मैं और तू, सब एक ही है
दाविशी दिव्य, जरी हे तू
गुरूदेव दयाघन, प्रसन्न तू
तुकड्या सांगे, परका न कुणी
एकच सगळे जण, मी आणि तू